घाना पक्षी विहार ( भरतपुर) भ्रमण।
सुबह के 6 बजे का वक्त था,,मथुरा से सबसे पहले भरतपुर जाने वाली गाड़ी में सवार हो गए। सुबह के कारण रेल के खिड़ियों से ठंडी हवा चल रही थी। ब्रज की भूमि, होली के कारणों होलियारों से भर रही थी,,,लोग अन्य जगह से मथुरा की ओर पधार रहे थे और मैं मथुरा छोड़कर पक्षी प्रेम में भरतपुर पहुँच रहा था।
वैसे जाड़ा तो अपने अंतिम समय में था,,,इसलिए हमें मालूम था कि अब उतने पक्षी नही होगें,,,पर जब मथुरा आ गया तो घाना भी जाने का इरादा हो गया।
पिछले दो साल से हर साल जाड़े में यह इच्छा होती की घाना चलना है,, पर मुराद पुरा नही हो पा रहा था। हाल में जब लोकसेवा की परीक्षा देने आगरा गया तो,,,यह काम निपटा दिया।
हम आगरा में न ठहर कर मथुरा के धर्मशाला में ठहरे थे,,इसलिए मथुरा से भरतपुर जा रहे थे।
ट्रेन में उस वक्त कोई भीड़ नही था। पर टिकट काउंटर पर बहुत भीड़,,,लगा की जब तक कतार में खड़ा रहेगें ,,गाड़ी चल देगा,,,किसी तरह टिकट काउंटर तक समय पर पहुँच गए। टिकट लेकर दौड़ते हुए प्लेटफार्म पर पहुँचा तो देखा गाड़ी लगी है। मन को राहत मिला,,,गाड़ी में सवार होने के बाद करीब दस मिनट तक गाड़ी और रूकी रही,,,किसी दुसरे गाड़ी के गुजरने के इंतजार में। इस समय हम गाड़ी में बैग रखकर प्लेटफार्म पर ही इधर- उधर टहल रहे थे,,किसी और अच्छे सीट के तालाश में।
इसी टहल में सामने एक पैसेंजर गाड़ी पर लिखा देखा आगरा -- झांसी-- नागपुर,,,तो लगा,,पैसेंजर से भी कोई जोड़- जोड़ कर कहाँ से कहाँ जा सकता है। अब हमारे गाड़ी के चलने का मौसम बन गया।
गाड़ी पर सवार होते ही,,,मथुरा को अलविदा कहते गाड़ी आगे भरतपुर की ओर रवानी में थी।यह एक अंतरराजकीय यात्रा चल रहा था,,,जिसमें आप सवार उत्तर- प्रदेश में होते हैं,,और महज आधे घंटे से कम समय में राजस्थान में आ जाते है।
मेरे साथ बैठे यात्री वहाँ के स्थानीय कामगर थे। रास्ता में वो मुझे गोवर्द्धन पर्वत के परिक्रमा पथ को दिखा रहे थे और यह बता रहे थे की हमलोग( राजस्थान) से आने वाले कहाँ उतरते है।
बातचीत में जब पूछा कितना समय लगता है तो कहा यह तो आदमी के चलने के क्षमता पर निर्भर करता है,,हमलोग तो इतने घंटे में परिक्रमा कर लेते है,,मैं जवान हुँ तो मुझे भी इतना ही समय लगेगा।
मार्च का महीना था(२१ मार्च) इसलिए खिड़की से बाहर देखने पर लाल सेमल और पापड़ी के पेड़ दिख रहे थे। खेत भी खाली नजर आ रहा था।हमे एक विशेष पेड़ के बारे में जानने का इच्छा हुआ ,,पर वो लोग भी उसे नही पहचान पा रहे थे। इसी तरह बातों का क्रम चल रहा था की पता चला की गाड़ी भरतपुर ज० पहुँच गयी। हमें इतनी कम दुरी पर है और इतनी जल्दी पहुँच जाएगे इसका उम्मीद नही था।
सलाम कर के गाड़ी से उतरा और जिधर अन्य मुसाफिर जा रहे थे,,उधर ही चल दिया। हाँ भरतपुर नाम लिखे पट्ट के सामने दो फोटो जरूर खिंचवालया।
प्लेटफार्म पर ही एक सज्जन से पक्षी विहार के बारे में पूछा ,,तो उन्होने बगल में ही आटो से बिजली घर या सारस चौराहा जाने का सलाह दिया। बिजलीघर से जरूर मिल जाएगा,, पहले वहाँ चले जाँए। वैसे सूर्योदय तो हो चुका था,,,पर शहर अभी तक सोया ही था,,सड़को पर उतनी गाड़ियाँ नही थी जितनी अमूमन सोमवार के दिन चलती है।
एक आटों में बैठकर हम बिजलीघर आ गए। बिजलीघर एक चौकनूमा जगह है,,वहाँ शायद हाइवे भी गुजरता है। यहाँ पहुँचने के बाद एक रिक्शा वाले से बात किया,,वो हमें घाना पक्षी विहार तक पहुँचाने का बात किया,,जबकि रिक्शा में कुछ किराया टेम्पु के तुलना में ज्यादा लगता है,,पर सुबह- सुबह बैठने का और शहर की थाह लेने का जो आनंद है ,,उसका किसी चीज से तुलना नही किया जा सकता है। उसी बिजली चौक पर केला ले कर रिक्शा पर सवार हो गए। रिक्शा पर बैठने से पहले हम उसे बोल दिए थे की मेरे पास पाँच सौ का नोट है,,,वह यह बोलकर बैठाया था की हो जाएगा छुट्टा।
रास्ते में केला खाते,,शहर देखते हम चल रहे थे। रिक्शा एक चौड़ी कम गाड़ियों वाली,,हालिया सिमेंट से बनी सड़क से जा रही थी। उस रास्ते में एक तरह एक तरह एक कॉलेज दिखा,,कलेकटर का दफ्तर या आवास भी। कॉलेज देखकर मन में विचार आ रहा था कि ऐसा न हो की राजस्थान के शिक्षक परीक्षा( Asst Prof) में चयन होकर ,,इसी कॉलेज में पढाना पड़े। इसका कारण था कि अप्रैल में ही इसका परीक्षा होना था,,,जो अभी हाल ही में जयपुर से देकर आए हैं।
घाना पर आने के बाद से ही लिखने का विचार चल रहा था,,,वरना कुछ छोटी-छोटी बातें भूलने का डर था। हकीकत तो यह है की छोटी- छोटी घटनाएँ और बाते हीं यात्रा और उसके संस्मरण, वृतांत को रोचक बनाती है। बड़ी- बड़ी और मोटी यादे तो बेजान होती है,,बस यादों के स्तंभ का कार्य करती है। चूँकी यात्रा का मोबाइल में था इसलिए भूलने का डर नही था,,,पर हर भाववाचक चीज का तो कोई फोटो नही रख सकता। इसलिए तत्काल उपजे विचार और भाव कैमरे के कैद से बाहर होतो हैं,,उन्हे कलमबद्ध करने का एक ही तरीका है की,,,यात्रा के एक सप्ताह के अंदर ही उन भाव या विचारों को लिख दे,,वरना फोटो देखकर कुछ बाते लिखी जा सकती है,,सब बातें नही।
उस सिमेंट के सड़क से रिक्शा आगे चलते हुए,,एक गली की तरफ मुड़ी और चलने लगी। कुछ आगे चलने के बाद एक दुकान के पास रूक गयी,,और मुझे कहा की यहाँ खुदरा माँगिए,,मिल जाएगा। दुकान की माली हालत,,,सामान देखकर ठीक लग रहा था। सोचा क्यों न कुछ ले लिया जाए,,,इसलिए पानी का एक बोतल खरीदा ,,इस तरह छुट्टा तो मिल गया। पुन: रिक्शा पर सवार होकर चलने लगे।
इस बार रिक्शा वाले से बात करते हुए पु्छ रहे थे की किस महीने में पर्यटक आते है,,,विदेशी ज्यादा आते हैं,,की भारतीय,,उस वक्त कितना कमा लेते हो,,वगैरह। वैसे बातचीत तो पहले भी कर रहे थे,,पर क्या बात हुआ था वो अब भूल गए।
वैसे घाना जाने से पहले वहाँ के बारे में कई विडियो YouTube पर देख चुकें थे,,अखबारों,, पत्रिकाओं,,किताबों में पढ चुके थे। बस गया आज तक नही था। हकीकत तो यह की प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवा इन जगहों का नाम कई वर्षों से जानते है। एक तो यह की इसे राष्ट्रीय उधान,, विश्वदाय स्थल( World Heritage site) का भी दर्जा प्राप्त है,,,और खास बात यह है की यह पक्षियों संबंधित है,,,बाघ,,हाथी,,गैंडा जैसे जंगली जानवरों से नही,,जिनके बारें में राष्ट्रीय उधान शब्द बार- बार प्रयोग किए जाते है।
विश्व दाय स्थल के रूप में भी लोगों के मन में ज्यादातर किला,,महल,,हवेली,,पुराना धार्मिक स्थल के जैसा चीज विचार में आता है,,,कोई जंगल,,तालाब या हरयाली जैसा जगह नही। जबकि मानस,,काजीरंगा ( आसाम) जैसे जगह भी हरित श्रेणी में विश्वदाय स्थल के रूप में शुमार है।
रिक्शा वालों से बात करते हुए थोड़ा आगे बढे की बह एक काली- चौड़ी सड़क के किनारे ला कर रोक दिया और उतरने का संकते किया। हम पुछे आ गए तो वह इशारा किया सामने देखिए। सामने केवलादेव घाना पक्षी 'राष्ट्रीय उधान का गेट,,और नाम पट्टी था।
सामने देखते ही लगा एक सपना सच हो गया,,,मुराद पुरा हो गाया,,,हम अपने तीर्थलोक के द्वार पर पहुँच गए। रिक्शेवाले को पैसे देकर विदा किया और सड़क पार कर अपने मंजिल के करीब पहुँचने लगा।
यह जो काली- चौड़ी चिकनी सकड़ है,,वह NH----11( आगरा- जयपुर रोड) है। अंदर जाने के बजाए पहले गेट से ही फोटो लिए,,,वहीं के एक कर्मचारी से अपना फोटो भी खिंचवाएँ उसके बाद अंदर गए।
उपर वाला फोटो भी उसी कारिंदे की कृपा है। अभी समय मुश्किल से सुबह के साढे सात बज रहे होगें। बाहर ही विश्वदाय स्थल की सूचना तथा अन्य निर्देशों को पहने के बाद किसी पहले हरित दाय स्थल( Green Heritage site) में कदम रख रहे थे। वैसे यह मेरा दुसरा 'राष्ट्रीय उधान में प्रवेश था।
किसी पक्षी विहार में तीसरा असफल और दुसरा सफल प्रवेश था। इससे पहले दिल्ली के ओखला पक्षी विहार गया था,,,और हरियाणा के सुल्तानपुर पक्षी विहार( यह भी अब राष्ट्रीय उधान है) में मंगलवार ( उस दिन बंदी रहता है) को बंदी के कारण नही जा सका।
वैसे अभ्यारण्य क्षेत्र से गुजरने का तो कई जगह मौका मिला है,,रेल से,,बस से ,,दोपहिया से पर किसी बने- बनाए गेट से नही गया था।
सुबह की ताजी हवा और जोश एंव उमंग के साथ हम केवलादेव के अंदर चले गए,,पक्षियों से आँखे चार करने।